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लोकसभा चुनाव से पहले जनता के सामने एक बार फिर आरक्षण का लॉलीपॉप

Posted by Admin on January 8, 2019 | Comment

Reservation

केन्द्र की सत्ताधारी मोदी सरकार ने सवर्णो को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। अब मोदी सरकार के इस फैसले को आम जनता से लेकर सियासी दिग्गज और राजनीतिकार अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। अगर बात करें विपक्ष की तो वह इसे आरक्षण से ज्यादा एक सियासी चाल बता रहा है क्योंकि  केन्द्र में बैठी मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक दो महीने पहले ही यह फैसला क्यों लिया। वह अपने कार्यकाल के साढ़े चार साल चुप क्यों रही और 2019 लोकसभा चुनाव से पहले वह तिलक, तराजू और तलवार की राजनीति क्यों कर रही है। 2018 विधानसभा चुनाव के दौरान तीन बड़े राज्यों में भाजपा की हार की वजह कहीं न कहीं सवर्णों की नाराजगी रही। इसलिए अब भाजपा सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से उनको साधने की कोशिश कर रही है। इससे असल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने में वह कामयाब रहें। देश में आरक्षण की राजनीति एक दिलचस्प दौर से गुजर रही है जिसको लेकर कई प्रश्न भी हैं।

क्या आरक्षण नीति से भाजपा को लोकसभा चुनाव में मिलेगा फायदा ?

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले गरीब सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण देकर मोदी सरकार ने एक मास्टर स्ट्रोक खेला है। पाँच राज्यों में मिली हार के बाद अब भाजपा केन्द्र से अपनी सत्ता गँवाना नहीं चाहती। एससी-एसटी एक्ट से जुड़े अध्यादेश पर सवर्णों की नाराजगी झेल रही भाजपा ने इस प्रस्ताव से उन्हें खुश करने की कोशिश की है। आपको बता दें कि तीन बड़े राज्यों, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार के बाद इस तरह की बात उठ रही थी, कि सवर्णों की नाराजगी के चलते भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि अभी यह कहना मुश्किल है कि भाजपा को इसका फायदा मिल पाएगा या नहीं। इससे पहले आपको बता दें कि 2014 में यूपीए सरकार ने भी लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जाटों को आरक्षण देने का फैसला किया था। लेकिन यूपीए को इसका फायदा नहीं मिला और उसे लोकसभा की जाट बाहुल्य सीटों पर करारी शिकस्त झेलनी पड़ी।

केन्द्र सरकार के इस फैसले को चुनौती दी जा सकती है या नहीं?

सवर्णों को आरक्षण देने के फैसले के पहले इस तरह का कोई आधार दस्तावेज तैयार नहीं किया गया है। जिसके आधार पर केंद्र सरकार के इस फैसले को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

सवर्ण मतदाताओं को अपने पक्ष में एकजुट करने का प्रयास और दूसरी तरफ बहुजनों के आरक्षण को कई हिस्सों में बांटकर उन्हें राजनीतिक तौर पर बिखेरने की योजना भारतीय जनता पार्टी के लिए एक नकारात्मक चुनावी संदेश साबित हो सकता है।

मोदी सरकार के दौरान पदोन्नति में आरक्षण नहीं देने के विरोध में आंदोलनों का सिलसिला चला है। बहुजनों के लिए आरक्षित हजारों सीटें वर्षों से खाली पड़ी हैं और संसद में भी इस मुद्दे को उठाया जाता रहा है।

आजादी के साथ ही शुरू हुई आरक्षण की सियासत

आपको बता दें कि आरक्षण की शुरुआत आजादी के साथ ही शुरू हो गई थी। 1901 में महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने गरीबी दूर करने के लिए पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की शुरुआत की थी। इसके बाद अंग्रेजों ने 1908 में आरक्षण शुरू किया था। मद्रास प्रेसिडेंसी ने 1921 में 44 फीसदी गैर-ब्राह्मण, 16-16 फीसदी ब्राह्मण, मुसलमान और भारतीय-एंग्लो/ईसाई को और अनुसूचित जातियों को लोगों को 8 फीसदी आरक्षण दिया गया था। इसके बाद 1935 में भारत सरकार अधिनियम के तहत लोगों को सरकारी आरक्षण सुनिश्चित किया था। बाबा साहब अम्बेडकर ने 1942 में सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग उठाई थी।

आरक्षण पर राजनीति

आरक्षण से राजनीति का रिश्ता बहुत ही पुराना है लेकिन इस समय मोदी सरकार ने सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर इसको हवा दे दी है। अब इस मुद्दे पर राजनीति अपने चरम पर है, कोई सवर्ण आंदोलन को चुनाव से जोड़कर देख रहा है तो कोई इसे सिर्फ सवर्णों की नाराजगी को दूर करने के लिए सिर्फ एक लॉलीपॉप बता रहा है। कुछ भी हो सत्य तो यह है कि आज युवाओं को अच्छी शिक्षा और रोजगार की जरूरत है लेकिन सत्ता में शामिल सभी राजनीतिक पार्टियाँ कुर्सी पर बैठकर समाज में आरक्षण के नाम पर राजनीति कर रही हैं। क्योंकि भाजपा  के लिए एक प्रश्न बिल्कुल साफ है। आपको एससी-एसटी लागू करने के वक्त सवर्णों की चिन्ता नहीं हुई। आपको चिन्ता तब हुई जब तीन बड़े सत्ताधारी राज्यों में आपको मुंह की खानी पड़ी। ये आधुनिक भारत की शिक्षित जनता है, वो बात अलग है कि देश की शिक्षित जनता कई आई-गई सरकारों के आर्शीवाद से बेराजगार है लेकिन इतनी समझदार तो है कि वह सभी प्रकार की चुनावी चालों को समझ पाए।