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लोकसभा चुनाव 2019 में कितना सफल रहेगा तीसरा मोर्चा?

Posted by Admin on January 15, 2019 | Comment

Lok Sabha elections लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है। वैसे-वैसे भाजपा के खिलाफ बन रहे महागठबंधन से एक-एक कर सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ अलग होती जा रही हैं। अब यह महागठबंधन उतना ज्यादा मजबूत नजर नहीं आ रहा है। जिसका दावा कुछ महीने पहले तक सभी विपक्षी पार्टियों के द्वारा किया जा रहा था। 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद राहुल गांधी द्वारा महागठबंधन को लेकर जिस प्रकार की सियासी रणनीति तैयार की जा रही थी। उसे देखकर लगता था कि आने वाला लोकसभा चुनाव मोदी बनाम महागठबंधन ही होगा। हालाँकि भाजपा के लिए यह चुनाव अभी भी मोदी बनाम सारा विपक्ष ही है। पर इस महागठबंधन में अब फूट पड़ गई है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह महागठबंधन पसंद नहीं आया। ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री व टीआरएस नेता चंद्रशेखर राव लगातार एक ऐसा फेडरल फ्रंट (तीसरा मोर्चा) बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें गैर-कांग्रेस और गैर-भाजपा दल शामिल हों।

भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे की भूमिका

तीसरे मोर्चे से पहले आपको यह जानना आवश्यक है कि यह है क्या, आपको बता दें कि भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे की शुरूआत आज से तीन दशक पहले शुरू हुई थी। 1989 भारतीय राजनीति का वह दौर था जब भाजपा एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी और उसके बाद यह तय हो गया कि राष्ट्र की राजनीति मुख्य तौर पर इन्हीं दो पार्टियों यानी कांग्रेस और भाजपा के इर्द-गिर्द घूमेगी। 1989 सिर्फ भाजपा के उभार का साल ही नहीं था, बल्कि कमंडल के साथ मंडल का दौर भी शुरू हो गया था। पिछड़े समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षत्रप अपने-अपने इलाकों में मजबूत हुए और कई क्षेत्रीय पार्टियां स्थाई तौर पर अपना जनाधार बनाने में कामयाब रहीं। इसके बाद 1989 के आम चुनाव में गैर भाजपा व गैर कांग्रेस दलों को 543 लोकसभा सीटों में से 261 सीटें मिली। उसके बाद प्रत्येक आम चुनाव में ये गैर भाजपा-कांग्रेसी पार्टियाँ 225 के आस-पास सीटें हासिल करती आई हैं। हालाँकि यह सीटें कभी भी बहुत शक्तिशाली साबित नहीं हो पाती हैं क्योंकि ये कभी एक साथ नहीं आई। पर इस बार 2019 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी एक ऐसे तीसरे मोर्चे की अगुवाई कर रही हैं। जिसमें गैर कांग्रेस व गैर भाजपा दल शामिल हों और उनका यह मोर्चा राष्ट्रीय राजनीति में एक ताकतवर उपस्थिति दर्ज करा सके।

देश की राजनीति में तीसरे मोर्चे का भविष्य

लोकसभा चुनाव में तीसरे मोर्चे के भविष्य की बात करें तो मौजूदा समय में राजनीतिक हालतों को देखकर लगता है कि ममता बनर्जी का यह तीसरा मोर्चा सरकार बनाने की रेस में पीछे है। पर इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि चुनाव के बाद जब भाजपा या कांग्रेस पूर्ण बहुमत लाने में असमर्थ रहती है तो उस वक्त ममता बनर्जी का यह तीसरा मोर्चा किंगमेकर की भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा कई राजनीतिकारों का भी यही मानना है कि 2019 में अगर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए बहुमत लाने से चूक गया तो ममता किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं।

इस बार 2014 जैसे एकतरफा परिणाम की बेहद कम गुंजाइश है इसी वजह से शायद ममता दीदी को उम्मीद है कि वह निश्चित तौर पर आने वाले चुनाव में तुरुप का इक्का साबित हो सकती हैं बशर्ते उनकी संभावना काफी हद तक कांग्रेस के प्रदर्शन पर निर्भर करती है।

फिलहाल अगर मौजूदा समय में तीसरे मोर्चे के बारे में बात की जाए तो पश्चिम बंगाल में लोकसभा की कुल 42 सीटों पर तीसरे मोर्चे का असर देखने को मिल सकता है। इसके अलावा तेलंगाना की कुल 17 लोकसभा सीटों पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। तीसरे मोर्चे के तहत तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की सभी क्षेत्रीय पार्टियों को भी अपनी ताकत दिखाने का अवसर मिलेगा।    

फिलहाल भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे के साथ आई ममता बनर्जी का यह कदम देश की सियासत में उनकी मजबूती को दर्शाएगा। सत्ता के फाइनल मैच से पहले हालात लगातार बदलते रहने की संभावना है। हालाँकि महागठबंधन से अलग होकर तीसरे मोर्चे की स्थापना से भाजपा अपने लिए बहुत ज्यादा संभावनाएं देख रही है।   

बंगाल में भाजपा पिछले कुछ समय से अपना जनाधार बढ़ाने की आक्रमक कोशिशें कर रही है, उसकी वजह से ममता बनर्जी बेहद सतर्क हैं। मौजूदा समय में भाजपा उनकी ही जमीन से उनका सफाया करने का प्लान बना रही है। जाहिर तौर पर ऐसे समय में ममता बनर्जी की भाजपा से ज्यादा बड़ी कोई भी दुश्मन पार्टी नहीं है। इसलिए ममता के लिए यह तीसरा मोर्चा एक तरह की मजबूरी है।