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भारत में दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधान

Posted by Admin on October 29, 2018 | Comment

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भारत में दलबदल विरोधी कानून के प्रावधान

दल बदल विरोधी कानून को 1985 में 52 वें संशोधन के माध्यम से अधिनियमित किया गया था और दसवीं अनुसूची में स्थापित किया गया था। यह अधिनियम एक अलग राजनीतिक दल में दल-बदल के आधार पर निर्वाचित सदस्यों की अयोग्यता के प्रावधानों को निर्धारित करता है।

इस कानून को राजीव गाँधी की अगुवाई वाली सरकार, जो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के चलते एक ज़बरदस्त बहुमत के साथ सत्ता में आई थी, की पहल पर अधिनियमित किया गया था।

दलबदल विरोधी कानून की आवश्यकता क्यों पड़ी?

राजीव गाँधी सरकार को इस कानून को इसलिए पेश करना पड़ा क्योंकि अस्सी के दशक में दल-बदल के बहुत सारे उदहारण देखे गए थे। इस संशोधन का उद्देश्य राजनीतिक दलों की संरचना में स्थिरता लाना और पक्ष-परिवर्तन को रोककर संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करना था।

इस समस्या से निपटने में शुरुआती विफलताएं प्रबल खरीद-फरोख्त और भ्रष्टाचार का कारण बनीं। इसलिए अनुसूची 10 को इस बीमारी से निजात पाने के लिए एक उपकरण के रूप में देखा गया। इस संवैधानिक उपाय का अर्थ था कि एक सदस्य को एक राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न के अंतर्गत संसद के लिए चुने जाने के बाद, वह सदस्य बाद में उस दल को छोड़ने या किसी अन्य दल में जाने का विकल्प नहीं चुन सकता था।

दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता के प्रावधान

अनुच्छेद 102 (2) और 191 (2) के तहत, यह उल्लेख किया गया है कि एक निर्वाचित सदस्य को अयोग्य घोषित किया जायेगा, यदि वह स्वेच्छा से एक राजनीतिक दल की अपनी सदस्यता दे देता है; यदि पूर्व अनुमति प्राप्त किये बिना वह अपनी पार्टी द्वारा जारी किये गए किसी निर्देश या ऐसा करने और कोशिश करने के लिए अधिकृत किसी व्यक्ति के विरुद्ध ऐसे सदन में मतदान करता है या मतदान में भाग नहीं लेता है।

ये प्रावधान राजनीतिक दलों के विलय की प्रासंगिकता के साथ बनाये जाते हैं। जब कोई विधानमंडल दल किसी अन्य पार्टी के साथ विलय करने का फैसला करता है और ऐसे निर्णय को इसके दो तिहाई सदस्यों से कम का समर्थन नहीं होता है तो यह अयोग्यता के दायरे के बाहर होता है।

सदन के अध्यक्ष को दसवीं अनुसूची के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए नियम तैयार करने का अधिकार दिया गया है। नियम सदन के समक्ष निर्धारित किए जाते हैं और सदन द्वारा संशोधनों / अस्वीकृति के अधीन होते हैं।

दलबदल कानून की खामियां और इसमें किये गए संशोधन

चुनावी सुधारों पर, दिनेश गोस्वामी समिति ने “चुनावी कानूनों के सुधार” पर अपनी रिपोर्ट में किसी राजनीतिक दल के विभाजित होने के मामले में अयोग्यता से छूट के संबंध में दसवीं अनुसूची के प्रावधान को हटाने का सुझाव दिया था।

अंततः, 91 वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2003 ने इसे संशोधित किया। इस प्रकार, पार्टी के सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों को कानून की नज़रों में वैधता बनाये रखने के लिए विलय के पक्ष में होना चाहिए।

किसी राजनीतिक दल में एक विभाजन को दल-बदली नहीं माना जायेगा, यदि एक पूरा का पूरा राजनीतिक दल किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय हो जाता है; यदि एक दल के चुने हुए सदस्यों द्वारा एक नए राजनीतिक दल का गठन होता है; यदि पुरुष या महिला या दल के किसी वैकल्पिक सदस्य ने दो दलों के बीच विलय स्वीकार नहीं किया है और ऐसे विलय के समय से एक अलग समूह के रूप में रहने का विकल्प चुना है।

निर्वाचित सदस्यों द्वारा दल-बदली करने पर, सम्बंधित दल उन सदस्यों को अयोग्य घोषित करने की सिफारिश करते हुए सदन के अध्यक्ष को एक याचिका भेज सकता है। यह सदस्यों को निष्कासित भी कर सकता है। हालाँकि इसका मतलब यह नहीं है कि वे सदस्य इस प्रकार सदन में अपनी सीटों को खो देते हैं।