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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 – अवधारणा और प्रासंगिकता

Posted by Admin on October 30, 2018 | Comment

Article 30 of the Indian Constitution - Concept and relevance

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 – अवधारणा और प्रासंगिकता

धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण भारत के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का आधार है। सभी धर्मों को इसी पैमाने पर रखने के साथ भारत ने हमेशा समानता के सिद्धांत की वकालत की है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 एक ऐसा प्रावधान है जो अल्पसंख्यक अधिकारों के संरक्षण को सुनिश्चित करता है।

अनुच्छेद 30 की अवधारणा

अनुच्छेद 30 को भारतीय संविधान के भाग III के तहत वर्गीकृत किया गया है जो भारत के नागरिकों को उनके धर्म, जाति और लिंग के अनपेक्ष दिए सभी मौलिक अधिकारों को स्पष्ट करता है। अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों के लिए “शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन” के अधिकार का समर्थन करता है।

धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी पसंद के शिक्षण संस्थानों को स्थापित करने के अधिकारों के अलावा यह अनुच्छेद सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित करता है कि अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित शैक्षिक संस्थानों के अनिवार्य अधिग्रहण के मामले में अल्पसंख्यक अधिकारों को रद्द न किया जाए। 1978 में भारतीय संविधान के 44 वें संशोधन के दौरान खंड (1ए) को अनुच्छेद में जोड़ा गया था। इस खंड को शामिल करने के पीछे प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अल्पसंख्यक संस्थान के अधिग्रहण में ‘उचित मुआवजा’ दिया जाना चाहिए।

अनुच्छेद 30 का खंड (2) अल्पसंख्यक संस्थानों को समता प्रदान करता है। यह बताता है कि सहायता प्रदान करते समय सरकार धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित किसी भी शैक्षिक संस्थान के खिलाफ भेदभाव नहीं करेगी।

अनुच्छेद 30 की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते मुद्दे

अनुच्छेद 30 ने एक खतरनाक उदाहरण स्थापित किया है। इस तथ्य, कि यह शैक्षणिक संस्थानों को ‘प्रशासन’ का अधिकार देता है, को गंभीर चिंता के साथ देखा जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि सरकार एक अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान के शासी निकाय के गठन और प्रबंधन पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण लागू नहीं कर सकती है। यहाँ तक कि ‘घोर भ्रष्टाचार’ की स्थिति में भी सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती है और प्रभार नहीं संभाल सकती है।

खंड 1(ए) की गंभीर आलोचना हुई क्योंकि यह अल्पसंख्यक संस्थानों को पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू करने के दायित्व से मुक्त करता है। यह उस संविधान के बिल्कुल विपरीत है जो पिछड़े वर्गों को आरक्षण प्रदान करता है। अनुच्छेद 30 गैर-सहायताप्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों को भी गरीबों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की जिम्मेदारी से मुक्त करता है, जैसा कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम में निर्दिष्ट है।

हालाँकि, अनुच्छेद 30 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अल्पसंख्यकों के साथ असमान व्यवहार न हो लेकिन, वास्तव में, यह एक ऐसे कानून के रूप में देखा जाता है जो गैर-अल्पसंख्यकों को अपने संस्थानों को “स्थापित और प्रशासित करने” के अधिकार से वंचित करता है। संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, अनुच्छेद 30 देश को धर्म के आधार पर विभाजित करता है क्योंकि हिंदुओं द्वारा संचालित संस्थानों में सरकारी हस्तक्षेप होता है, जबकि अल्पसंख्यक संस्थान पूर्ण स्वायत्तता का आनंद लेते हैं।

यह स्पष्ट है कि अनुच्छेद 30 कुछ लोगों के अधिकारों की रक्षा करता है और बहुसंख्यकों को उनके अधिकारों से वंचित करता है। हाल के दिनों में हुए विकास से संकेत मिलता है कि सांप्रदायिक असंतुलन बढ़ने की संभावना बढ़ रही है क्योंकि कई संस्थानों ने फायदा उठाने के लिए अल्पसंख्यक स्थिति का दावा करना शुरू कर दिया है।