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क्या यूपी में बसपा से गठबंधन, सपा के लिए साबित होगा घाटे का सौदा?

Posted by monika shukla on February 23, 2019 | Comment

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up alliance seat sharing advantage to mayawati, Loss to Sp

लोकसभा चुनाव 2019 की सियासी लड़ाई दिन प्रतिदिन रोचक होती जा रही है। यूपी में भाजपा को रोकने के लिए सपा-बसपा ने गठबंधन करके चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी की। हम इस गठबंधन को एक अवसरवादी गठबंधन भी कह सकते है क्योकि 2019 का महागठबंधन किसी भी प्रकार के लोक कल्यणाकारी कार्य या विकास के लिए नहीं है बल्कि मोदी को रोकने के लिये सियासत का महायोग है।

आपको बता दें कि कभी एक दूसरे की साथी रहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने करीब 25 साल बाद एक बार फिर साथ आने का ऐतिहासिक ऐलान किया। पिछले दिनों सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में बसपा मुखिया मायावती ने इसकी घोषणा की। दोनों दलों के बीच बनी सहमति के मुताबिक, यूपी की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 38 पर बसपा और 37 पर सपा चुनाव लड़ेंगी। हालांकि इस गठबंधन से कांग्रेस बाहर है लेकिन गांधी परिवार की परंपरागत गढ़ रही अमेठी और रायबरेली की सीट पर गठबंधन अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी। बाकी 2 सीटें अन्य दलों के लिए रखी गई। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कई बार कहा है कि जिस तरह 1993 में हमने साथ मिलकर भाजपा को हराया था वैसे इस बार भी हराएगे लेकिन शायद वह यह भूल गई हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा का प्रर्दशन कितना मजबूत रहा था। इसके अलावा यूपी के विधानसभा परिणाम तो उन्हें याद ही होगे।

गठबंधन में अखिलेश से ज्यादा चलती है माया की मर्जी

मायावती के बारे में एक बात तो बिल्कुल साफ है कि वह अपनी शर्तों पर राजनीति करती हैं। लोकसभा चुनाव 2014 और यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में बसपा को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में अगस्त 2017 में भाजपा भगाओ देश बचाओ पटना की रैली में जहां सभी विपक्षी दल जाने को तैयार थे, वहीं मायावती ने जाने से इनकार कर दिया। उन्होंने न जाने का कारण बताते हुए कहा था कि किसी भी गठबंधन में वह सीट बंटवारे से पहले कोई भी मंच साझा नहीं करेंगी। मायावती अपने इस नीति और फार्मूले पर कायम रहीं। वह लगातार कहती रहीं कि वह सम्मानजनक स्थिति पर ही समझौता करेंगी और गुरुवार को (सीट बंटवारे के फैसले के बाद ) उनके कथन के मुताबिक तस्वीर बिल्कुल साफ हो गई।

दरअसल सीट बंटवारे पर गौर करे तो सपा के खाते में जो सीटें आई हैं, उनमे से करीब 9 से 10 सीटें ऐसी हैं, जहां उसकी राह आसान नहीं होगी। वहीं बसपा के खाते में सपा की तुलना में बेहतर उम्मीदों वाली सीटें गई हैं। गठबंधन का फार्मूला यही तय हुआ था कि 2014 में जो जहां से दूसरे नंबर पर था, वह वहीं से चुनाव लड़ेगा। हालांकि इस फॉर्मूले पर पूरी तरह से अमल नहीं किया गया है। साथ ही सपा को अधिकतर शहरी सीटें हासिल हुई हैं, जो कि भाजपा का गढ़ मानी जाती हैं। बसपा को अधिकांश ग्रामीण अंचल की सीटें मिली हैं।

सपा के लिए साबित हो सकता है घाटे का सौदा

यूपी में सपा-बसपा गठबंधन एक होकर चुनाव लड़ रही है तो इसमें किसी एक के नफा-नुकसान की बात ही नहीं है लेकिन यूपी में जिस तरह के सियासी समीकरण बनते हुए नजर आते है। उससे कही न कही सपा का सियासी भविष्य धुंधला नजर आता है। इस गठबधंन का नेतृत्व सूबे के दो बड़े नेता मायावती और अखिलेश यादव कर रहे है लेकिन इस गठबंधन में अब तक लिए गए प्रत्येक फैसले पर अंतिम मुहर मायावती ही लगाती रही है। या यू कहें कि अखिलेश- मायावती की शर्तों पर काम कर रहे है। इसका एक उदाहरण सीटों के बंटवारे में भी देखने को मिला।

सपा के लिए गठबंधन का सौदा मुश्किले खड़ा कर सकता है। बंटवारे में सपा के कोटे में वाराणसी, लखनऊ, गाजियाबाद व गोरखपुर जैसी मुश्किल सीटें आई हैं। सपा के एक पूर्व मंत्री का कहना है कि बंटवारे में असंतुलन अधिक हो जाने से सपा 37 सीटों के बजाय 28 से 30 सीटों पर ही मजबूती से लड़ पाएगी। इतना ही नहीं पश्चिमी यूपी में संगठन को बचाना भी सपा के लिए मुश्किल होगा। दरअसल मुजफ्फरनगर दंगे के बाद पश्चिम के जिले सपा के लिए कठिन माने जाते रहे हैं। माना जा रहा है कि अगर बसपा का दलित व मुस्लिम गठजोड़ और रालोद का जाट मुस्लिम समीकरण मजबूत हो गया तो सपा के लिए भविष्य में दिक्कतें और बढ़ेंगीं। मेरठ और सहारनपुर मंडल की एक-एक सीट ही सपा के कोटे में आई है। मुस्लिम बाहुल्य इस इलाके में बसपा की ओर मुसलमानों का रुझान बना रहा तो आने वाले दिनों में सपा को अपना संगठन बचा पाना भी आसान नहीं होगा। वहीं सपा को 15 सीटें ऐसी मिली हैं, जहां वह पिछले चुनावो में तीसरे स्थान पर थी ये सीटें हैं- कैराना, गाजियाबाद, हाथरस, खीरी, हरदोई, लखनऊ, कानपुर, बांदा, फूलपुर, फैजाबाद, कौशाम्बी, महाराजगंज, चंदौली, मिर्जापुर और राबर्ट्सगंज।

महागठबंधन से नाराज मुलायम

सपा-बसपा गठबंधन को लेकर समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने पार्टी के अध्यक्ष और अपने बेटे अखिलेश यादव के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा, “सपा की हैसियत बसपा से ज्यादा है, पार्टी को खत्म कौन कर रहा है? अपनी पार्टी के लोग। इतनी मजबूत पार्टी बनी थी। अकेले तीन बार सरकार बनाई, तीन बार हम मुख्यमंत्री रहे। रक्षामंत्री भी रहे, मजबूत पार्टी थी। हम राजनीति नहीं कर रहे, लेकिन हम सही बात कर रहे हैं। जाहिर तौर पर मुलायम सिंह के इस बयान के बाद पार्टी के पुराने नेताओं पर असर पड़ेगा जो अखिलेश के गठबंधन के लिए सहीं नहीं है। इसके अलावा मुलायम सिंह ने यह भी कहा कि यूपी में सपा की सीधी लड़ाई भाजपा से है, लड़ाई में तीसरी कोई भी पार्टी नहीं है, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रदेश में बसपा से गठबंधन किया है, जिसकी वजह से पार्टी की सीटें आधी रह गई हैं। इसका सीधा असर अपने ही लोगों पर होगा।

कुल मिलाकर यूपी में सपा-बसपा गठबंधन में किसका फायदा है इसके बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता, लेकिन मौजूदा समय में यूपी की राजनीति में जिस प्रकार के समीकरण बनते हुए दिखाई दे रहे है। उससे सपा के नुकसान के आसार जरूर लग रहे है।

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