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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20

Posted by Admin on October 17, 2018 | Comment

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भारतीय संविधान का अनुच्छेदअनुच्छेद 20 भारत के संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का एक स्तम्भ है। यह मुख्य रूप से अपराधों के लिए दोषसिद्धि के मामले में विशेष अधिकारों की सुरक्षा से सम्बंधित है। जब किसी व्यक्ति या निगम पर अपराध का आरोप लगाया जाता है, तो अनुच्छेद 20 के प्रावधान उनके अधिकारों की रक्षा करते हैं। अनुच्छेद 20 की अद्भुत विशेषता यह है कि इसे आपातकालीन अवधि के दौरान रद्द नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद ने संघ और राज्य विधायिकाओं की विधायी शक्तियों पर कुछ सीमाएं निर्धारित की हैं।

एक्स पोस्ट फैक्टो कानून

अनुच्छेद 20 का खंड (1) एक्स पोस्ट फैक्टो कानून के खिलाफ व्यक्तियों की सुरक्षा करता है, जिसका मतलब है कि इस कानून के अधिनियमन से पहले किए गए कार्यों के लिए किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो जब एक विधायिका किसी कृत्य को एक अपराध घोषित करती है या किसी अपराध के लिए दंड देती है तब यह कानून को उन लोगों के लिए हानिकार रूप से पूर्वव्यापी नहीं बना सकती जिन लोगों ने ऐसे कृत्य उस कानून के अधिनियमन से पहले किये हों।

दोहरी सजा से प्रतिरक्षा

भारत का संविधान एक ही अपराध के लिए दोहरी सजा पर रोक लगाता है। यह अनुच्छेद 20 के खंड (2) में निर्दिष्ट है, जो किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए उत्तरोत्तर आपराधिक कार्यवाही या कई सजाओं का सामना करने से बचाता है। इस खंड के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक दण्डित नहीं किया जायेगा और उस पर मुकदमा नहीं चलाया जायेगा।

यदि किसी व्यक्ति को एक अपराध की पिछली कार्यवाही में ट्रायल पर रखा जा चुका है और सजा दी गयी है तो उसे बाद की कार्यवाही में दोबारा एक अपराध की उसी कार्यवाही के लिए दण्डित नहीं किया जा सकता।

यद्यपि अनुच्छेद 20 ‘दोहरे खतरे’ के सिद्धांत को अस्वीकार करता है लेकिन यह एक न्यायालय या ट्रिब्यूनल के समक्ष कार्यवाही से प्रतिरक्षा नहीं देता है। इसलिए, एक सरकारी कर्मचारी जिसे कानून की अदालत में अपराध के लिए दंडित किया जा चुका हो, फिर भी उसे उसी अपराध के लिए विभागीय कार्यवाही के अधीन किया जा सकता है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि अनुच्छेद 20 केवल दोहरे दंड के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है जब आरोपी पर एक बार मुकदमा चलाया जा चुका हो और उसे सजा दी जा चुकी हो। साथ ही, यह अनुच्छेद किसी अन्य अपराध के लिए अनुवर्ती ट्रायल और दोषसिद्धि से नहीं बचाता है, भले ही दोनों अपराधों में कुछ आम पहलू हों।

स्व-दोषारोपण से प्रतिरक्षा

संविधान के अनुच्छेद 20(3) में स्व-दोषारोपण से प्रतिरक्षा प्रदान की गयी है जिसमें कहा गया है कि अभियुक्त को कभी भी स्वयं के खिलाफ गवाह होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। संक्षेप में, किसी भी व्यक्ति को खुद पर आरोप लगाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘गवाह’ शब्द की मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य के समावेशी के रूप में व्याख्या करते हुए इस प्रतिरक्षा के दायरे को बढ़ा दिया गया है। इसलिए, किसी भी व्यक्ति को ऐसे किसी भी प्रकार के साक्ष्य को प्रस्तुत करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है जो उसके खिलाफ मुकदमा चलाने में मदद कर सकते हों। इस ‘मौन का अधिकार’ का तब इस्तेमाल नहीं होता है जब आरोपी के पास कोई वस्तु या दस्तावेज पाया जाता है और जब्त किया जाता है। इसी वजह से, यह खंड अभियुक्त की चिकित्सा परीक्षा या अंगूठे की छाप या हस्ताक्षर का नमूना प्राप्त करने से नहीं रोकता है।

यह प्रतिरक्षा केवल आपराधिक कार्यवाही तक ही सीमित है।

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