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अनुछेन्द 35-ए संविधान का वो अदृश्य हिस्सा, जो छीन रहा है लाखों कश्मीरियों का मानवाधिकार

Posted by monika shukla on February 28, 2019 | Comment

अनुछेन्द 35-ए संविधान का वो अदृश्य हिस्सा, जो छीन रहा है लाखों कश्मीरियों का मानवाधिकार 4.20/5 (84.00%) 5 votes

Article 35-A is the invisible part of the constitution, which is stripping the human rights of millions of Kashmiris

ऐसा लगता है कि धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर का अभी तक भारत में पूरी तरह से विलय ही नहीं हुआ। यह देश के बाकी राज्यों की तरह नहीं है। अनुच्छेद 35-ए ‘इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ का पालन करता है और इस बात की गारंटी देता है कि जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता बाधित नहीं की जाएगी। फिलहाल जम्मू कश्मीर में लागू अनुछेन्द 35-ए का समाधान तो अभी नजर नहीं आ रहा है लेकिन इस मुद्दे पर राजनीति अपने चरम पर है। दिलचस्प बात तो यह है कि इस मुद्दे पर वो नेता बोलते हैं जिनको ये तक नहीं पता कि अनुछेन्द 35-ए है क्या?

संविधान में नहीं अनुछेन्द 35-ए का जिक्र

आपको जानकर हैरानी होगी कि संविधान की किताबों में न मिलने वाला अनुच्छेद 35-ए जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को यह अधिकार देता है कि वह ‘स्थायी नागरिक’ की परिभाषा तय कर सके। दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 35-ए को 14 मई 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से संविधान में जगह मिली थी। संविधान सभा से लेकर संसद की किसी भी कार्यवाही में, कभी अनुच्छेद 35-ए को संविधान का हिस्सा बनाने के संदर्भ में किसी संविधान संशोधन या बिल लाने का जिक्र नहीं मिलता है। अनुच्छेद 35A को लागू करने के लिए तत्कालीन सरकार ने धारा 370 के अंतर्गत प्राप्त शक्ति का इस्तेमाल किया था। अनुच्छेद 35-ए की सही-सही जानकारी आज कई दिग्गज अधिवक्ताओं को भी नहीं है।

अनुच्छेद 35ए से जुड़े कई सवाल भी हैं। जैसे अनुच्छेद 35-ए असंवैधानिक है तो सर्वोच्च न्यायालय ने 1954 के बाद से आज तक कभी भी इसकी संवैधानिकता पर बहस क्यों नहीं की? यदि यह भी मान लिया जाए कि 1954 में नेहरु सरकार ने राजनीतिक कारणों से इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल किया था तो फिर किसी भी गैर-कांग्रेसी सरकार ने इसे आज तक समाप्त क्यों नहीं किया? इस मामले को उठाने वाले लोग मानते हैं कि ज्यादातर सरकारों को इसके बारे में पता ही नहीं था शायद इसलिए ऐसा नहीं किया गया होगा। फिलहाल कारण चाहे कुछ भी रहें हो लेकिन इस समस्या का समाधान आई गई किसी भी सरकार द्वारा नहीं किया गया। या यूं समझ लें कि हमारी राजनीति कश्मीरियों के मानवाधिकार पर भारी पड़ गई। कश्मीर के हालातों को देखकर लगता है कि कश्मीर के अन्दर एक अलग तरह का भारत निवास करता है। जो धारा 370 के तहत कश्मीरियों को विशेषाधिकार देता है तो वहीं लाखों लोगों से अनुच्छेद 35ए के कारण उनके मानवाधिकार तक छीन लेता हैं।   

क्या है अनुच्छेद35-ए

अनुच्छेद 35ए से जम्मू-कश्मीर की सरकार को वहां की विधानसभा को स्थायी निवासी की परिभाषा तय करने का अधिकार मिलता है। इसका मतलब है कि राज्य सरकार को ये अधिकार है कि वो आजादी के वक्त दूसरी जगहों से आए शरणार्थियों और अन्य भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर में किस तरह की सहूलियतें दे या न दे।

1975 में लगे आपातकाल को भारतीय गणतंत्र का सबसे बुरा दौर माना जाता है। इस दौरान नागरिक अधिकारों को ही नहीं बल्कि भारतीय न्यायपालिका और संविधान तक को राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ा दिया गया था। ऐसे कई संशोधन इस दौर में किये गए हैं जिन्हें आज तक संविधान के साथ हुए सबसे बड़े खिलवाड़ के रूप में देखा जाता है लेकिन क्या इस आपातकाल से लगभग बीस साल पहले भी संविधान के साथ ऐसा ही एक खिलवाड़ हुआ था? ‘जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र’ की मानें तो 1954 में एक ऐसा ‘संवैधानिक धोखा’ किया गया था। जिसकी कीमत आज तक लाखों लोगों को चुकानी पड़ रही है।

अनुछेन्द 35-ए पर सुनावाई को लेकर क्यों बन जाता है घाटी में तनाव

सवाल ये है कि अनुच्छेद 35-ए के नाम पर ऐसा क्या है जिससे हुर्रियत की चीखें निकल जाती हैं? हुर्रियत नेता बिलाल वार का कहना है कि 35-ए के कारण कश्मीर एक है। अगर इसे हटाया गया तो जंग छिड़ जाएगी। हालांकि, अनुच्छेद 35-ए को लेकर घाटी में सभी पार्टियां अपना राजनीतिक हित साधते नजर आती हैं। कश्मीर के अलगावादी नेता ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि अनुच्छेद 35-ए के हटते ही उनकी दुकाने बंद हो जाएंगी। अगर ऐसा नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भर से हुर्रियत नेता कश्मीर को क्यों डरा रहे हैं और देश को धमका रहे हैं?

अनुछेन्द 35ए जो पिछले कई सालों से छीन रहा कश्मीरियों  के मानवाधिकार

‘अनुच्छेद 35ए दरअसल अनुच्छेद 370 से ही जुड़ा है और अनुच्छेद 370 एक ऐसा विषय है जिससे न्यायालय तक बचने की कोशिश करता है। यही कारण है कि इस पर आज तक स्थिति साफ नहीं हो सकी है।’ अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेषाधिकार तो देता है लेकिन कुछ लोगों को विशेषाधिकार देने वाला यह अनुच्छेद कुछ अन्य लोगों के मानवाधिकार भी छीन रहा है।

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