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2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने एक मजबूत विपक्ष के रुप में कांग्रेस

Posted by Admin on December 17, 2018 | Comment

2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने एक मजबूत विपक्ष के रुप में कांग्रेस 5.00/5 (100.00%) 1 vote

2019 Lok Sabha elections

 

2019 का  सेमीफाइनल 

2019 का  सेमीफाइनल कहे जाने वाले 2018 के विधानसभा चुनाव भाजपा (एनडीए) के लिए बुरी खबर लेकर आए। या यू कहे कि 2019 में सत्ता के फाइनल से पहले ही भाजपा को मुँह की खानी पड़ी और राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पाँच में से तीन राज्यों में अपनी सरकार बनाने में सफल रही। विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद जिस प्रकार से कांग्रेस एक बार फिर से उभर कर सामने आई है। उससे एक बात तो साफ है कि 2019 के महाभारत की लड़ाई अब कांटे की होगी। फिलहाल इस महाभारत में कौन कौरव होंगे और कौन पांडव, इस बात का फैसला तो मतदाता ही करेंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बात करें 2014 की तो भाजपा जिस जादुई आंकड़े के साथ सत्ता में आई थी, वही भाजपा 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में उस जादुई आंकड़े से काफी दूर नजर आ रही है। इसका मुख्य कारण भाजपा के सामने एक मजबूत विपक्ष के रुप में कांग्रेस को माना जा रहा है।

 2014 में भाजपा की अप्रत्याशित जीत के कई प्रमुख कारण माने जाते रहे हैं जिनमें से दो प्रमुख हैं। 

कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की नाकामियां और दूसरा मोदी लहर।

में सवाल यह है कि भाजपा 2019 के चुनाव में अपने पुराने रिकॉर्ड को बदल कर एक नया इतिहास रचने में कामयाब हो पायेगी या नहीं।

 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले भारी बहुमत ने कांग्रेस के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया था। वर्तमान की बात करे तो 2014 की अपेक्षा राजनीतिक स्थितियों में काफी कुछ बदल गया है। 2014 में भाजपा की लहर या यू कहें की भाजपा की आंधी ने कांग्रेस जैसी बड़ी और पुरानी पार्टी के छक्के छुड़े दिए थे। 2019 में उसी प्रकार की जीत को दोबारा दोहराना भाजपा के लिए उतना आसान नहीं होगा क्योकि अब उसके सामने कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष के रुप में है। इसके अलावा 2014 के राहुल गांधी और आज के राहुल गांधी में भी एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है। राजनीतिकारों का मानना है कि 2014 की राजनीति में राहुल गांधी (पप्पू) की कमजोर छवि कही न कही भाजपा को ऊपर उठाने में एक तिनके का सहारा दे गई थी। एक कहावत है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस बार स्थिति पहले से अलग है 2018 में सत्ता का सेमीफाइनल कहे जाने वाले विधानसभा चुनाव में जीत ने राहुल को पप्पू नाम से छुटकारा तो दिलवा ही दिया साथ ही राहुल के नेतृत्व पर उठ रहे सवालो पर भी विराम लगा गया।

 राहुल के नेतृत्व में आक्रामक कांग्रेस, मोदी के लिए चुनौती

अभी तक भाजपा राहुल गांधी को फेल बताकर पीएम मोदी को 2019 के निर्विवाद नेता के रूप में पेश कर रही थी। पर अब लोकसभा चुनावों के लिए कुछ ही महीने शेष है तो भाजपा के लिए ऐसा करना बहुत मुश्किल हो रहा है। राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ने हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्यों में भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया है। जाहिर तौर पर अब राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और आक्रामक दिखेगी। राहुल ने जीत के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बात के संकेत भी दे दिए और कहा कि वह नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दे उठाते रहेंगे। यानी राहुल को समझ में आने लगा है कि लोगों ने शायद इन मुद्दों से कनेक्ट होकर कांग्रेस की सत्ता में वापसी की राह प्रशस्त की है। 

 विपक्ष का मजबूत गठबंधन की दिशा में आगे बढ़ना, भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती

 2019 लोकसभा चुनाव में विपक्ष का एक मजबूत गठबंधन बनाने की दिशा में आगे बढ़ना

भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन पहले ही उपचुनाव में भाजपा को इसका नजारा दिखा चुका है। कांग्रेस भी अब राज्य-स्तरीय पार्टियों, जैसे महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा, कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) और अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाने की दिशा में आगे बढ़ चुकी है। अगर इस प्रकार से विपक्ष 2019 में एक मजबूत गठबंधन बनाने में सफल रहा तो 2019 का चुनाव कई मायनों में बेहद रोचक होने वाला है।

 पाँच राज्यों में सत्ता गंवाने के बाद भाजपा 2019 में सत्ता वापसी के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही है। कांग्रेस ने भले ही विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रर्दशन किया है लेकिन आप इस बात को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते कि मध्यप्रदेश और राजस्थान में भारी सत्ता विरोध के बावजूद भाजपा कांग्रेस को कड़ी टक्कर देती रही। पर अगर आप 2019 में भाजपा के प्रर्दशन की बात करे तो वह विपक्ष से ज्यादा अपने ही बड़बोलों में फसी हुई नजर आएगी। जैसे कि आप राम मंदिर और कालेधन जैसे बड़े मुद्दों को ही ले लीजिए। 2014 में भाजपा पर जिस प्रकार से राम मंदिर का राग अलाप रही थी उसे देखकर लगता था कि 2019 से पहले ही मंदिर निर्माण हो जाएगा पर क्या हुआ? 15 लाख किसके खाते में आए पता नहीं जो थोड़ा बहुत बचा था उसे एससी-एसटी एक्ट ले डूबा। या यू कहे कि जिस हिदुत्व के सहारे भाजपा सत्ता में आई थी आज वही हिन्दू अपने आपको इस सरकार में ठगे हुए महसूस कर रहे है। अब देखना यह है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने दावों और वादों पर खरी उतरकर सरकार बनाएगी या विपक्ष उसे पटकनी देने में कामयाब होगा।

 

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