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बसपा की सीटों की माँग पूरी कर पाना सहयोगी दलों के चुनौतीपूर्ण

Posted by Admin on November 23, 2018 | Comment

बसपा की सीटों की माँग पूरी कर पाना सहयोगी दलों के चुनौतीपूर्ण 2.00/5 (40.00%) 1 vote

बसपा की सीटों की माँग

विश्वास और अतिविश्वास दो बहुत ही सामान्य शब्द हैं जो हर जगह और हर किसी पर लागू होते हैं। इन दिनों मायावती का कांग्रेस और अन्य पार्टियों के साथ समझौता वार्ता करने का तरीका अतिविश्वास से भरा हुआ है। इस लेख में मैं कुछ ऐसे ही कारणों को उजागर करना चाहता हूं कि बसपा अपनी गठबंधन पार्टियों के साथ समझौता वार्ता मेंइतनी आक्रामक क्योंहै जबकि पिछले लोकसभा चुनाव के साथ-साथ यूपी विधानसभा चुनावों में भी उनकी सीटों की संख्यामें निरंतरगिरावट देखने को मिलीहै।

पहला कारण: बसपा का सीटों में तो नुकसान हुआ है लेकिन उनके वोट शेयर में गिरावट नहीं आई है।

2017 में बसपा को 22.2 प्रतिशत वोटों के साथ 4.7 प्रतिशत सीटें प्राप्त हुईं, जबकि 2012 में बसपा को 25.9 प्रतिशत वोटों के साथ 19.8 प्रतिशत सीटें प्राप्त हुईं।

कुछ ने कहा की उनके भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया, कुछ ने बताया कि यह भाजपा की एक सफल रणनीति का नतीजा है लेकिन सच्चाई तो यह है कि बसपा के पास अब भी दलित और अन्य समुदायों का भारी वोट बैंक मौजूद है। अब चुनाव से पहले ऐसा लगता है कि मायावती ने यह महसूस किया है कि इस बार कीसमझौता वार्तावोटों में आ रही गिरावट पर आधारित होगी न कि सीटों पर, क्योंकि उनकी किस्मत हर बार इतनी खराब नहीं हो सकती।

हालांकि, समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन भी अंतिम समय तक यानी सीटों के आवंटन को अंतिम रूप देने तक  सामान्य सा ही दिखाई पड़ता है।

कारण 2:  बसपा अपनी पार्टी कीराष्ट्रीय छवि को मजबूत बनाना चाहती है

बसपा,अपनी पार्टी की राष्ट्रीय छवि को मजबूत बनाने के लिए, न केवल उत्तर प्रदेश से, बल्कि अन्य उत्तर भारतीय राज्यों से भीलाभ उठाने की कोशिश भी कर रही है और यहअन्य गठबंधन पार्टियों के साथ समझौता वार्ता के दौरान नर्मी सेपेश आने से संभव नहीं होगा।

लेकिन मुद्दा यह है कि बसपा यह का दृष्टिकोण मात्र कुछ क्षेत्रीय दलों पर ही काम कर सकता है, लेकिन कांग्रेस जैसी एक राष्ट्रीय पार्टी भला इस बात से सहमत क्यों होगी, भले ही वो पिछले 70 वर्षों में से मौजुदासमय में एक बहुत ही खराब दौर से गुजररहीहै।

कारण 3: तीसरे मोर्चे की सरकार की नेता बनने का मौका

महा-गठबंधन के लिए वार्ता जारी हैऔर हर कोई इस संयोजन का नेतृत्व करने के लिए एक नए चेहरे की तलाश में है। अब अटल बिहारी बाजपेई जैसे व्यक्तित्व को प्राप्त कर पाना – जिनके बहुत से प्रतिद्वंद्वी थे लेकिन दुश्मन कोई नहीं – आज के राजनीतिक परिदृश्य में लगभग असंभव है, इसलिए चुनाव के बाद किसी पार्टी द्वारा जीती गई अधिकांश सीटों के आधार पर ही केवल किसीनेता के चेहरे को अंतिम रूप दिया जा सकता है।

 

इसलिए, उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटों पर विचार करते हुए, मायावती काआक्रामक दृष्टिकोण पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तुलना में उन्हें लोकसभा चुनावों में अधिक मदद करेगा।

कारण 4: उच्च जाति वोट बैंक में एक छोटी दरार हाथी की चाल को कामयाब करेगी

बसपा अपने आप में यह मानती है कि इसका वोट बैंक बहुत वफादार है और जो अन्य पार्टियों में नहीं जाएगा।दूसरी ओर यदि बसपा अन्य पार्टियों से कुछ समर्थन प्राप्त करने में सफल रहती है तो इससे उत्तर प्रदेश में उसे अधिकतम सीटें हासिल करने में मददमिलेंगी।

एक वैकल्पिक रणनीति के रूप में, बसपा भी ब्राह्मणों सहित उच्च जातियों की दिशा में अपनी रणनीति बदलने की कोशिश में है।

यह कहकर कि अंतिम परिवर्तन और संयोजन इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनाव के नजदीक आने पर भाजपाकैसे प्रतिक्रिया देती है।

अंतिम टिप्पणी – भले ही बसपा विपक्ष की ड्राइविंग सीट परहोनाचाहतीहै,लेकिन वो इसकी वास्तविकता से कोषों दूर दिखाई देती है।

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