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उपरोक्त में से कोई नही (नोटा)



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नोटा का इतिहास - यह कैसे अस्तित्व में आया, यह किसका विचार था?

"उपरोक्त में से कोई भी नहीं 'मतपत्र विकल्प का विचार 1976 में आया जब इस्ला विस्टा नगर सलाहकार परिषद ने संयुक्त राज्य अमेरिका में सांता बारबरा, कैलिफोर्निया में आधिकारिक चुनावी मतपत्र में इस विकल्प को बढ़ाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। वाल्टर विल्सन और मैथ्यू लैंडी स्टीन, उस समय के परिषद के मंत्रियों ने चुनाव के लिए मतपत्र प्रक्रिया में कुछ बदलाव करने के लिए एक कानूनी प्रस्ताव प्रस्तुत किया। 1978 में, नेवादा राज्य द्वारा मतपत्र में पहली बार 'उपर्युक्त में से कोई नहीं' (नोटा) का विकल्प प्रस्तुत किया गया था। कैलिफोर्निया में, इस मतपत्र विकल्प को बढ़ावा देने के लिए कुल 987,000 डॉलर खर्च किए गए थे लेकिन मार्च 2000 के आम चुनाव में यह 64% से 36% के अंतर से कम हो गया था। अमेरिकी राज्य और संघीय सरकारों के सभी वैकल्पिक कार्यालयों के लिए यह नया मतपत्र विकल्प एक नई मतदान प्रणाली के रूप में घोषित किया गया होगा, अगर मतदाता इसे पारित कर देते।

नोटा को किसने प्रस्तावित किया?

भारत में, 2009 में, भारत के निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी कि मतदाता को मतपत्र पर 'उपरोक्त में से कोई नहीं' विकल्प प्रदान करें जिससे मतदाताओं को किसी भी अयोग्य उम्मीदवार का चयन न करने की आजादी होगी। सरकार इस तरह के विचार के पक्ष में नहीं थी।

"पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज" जो एक गैर सरकारी संगठन है, ने नोटा के पक्ष में जनहित बयान दर्ज किया। आखिरकार 27 सितंबर 2013 को, चुनाव में 'उपर्युक्त में से कोई नहीं' वोट पंजीकृत करने का अधिकार भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा लागू किया गया था, जिसके बाद चुनाव आयोग ने आदेश दिया कि सभी वोटिंग मशीनों में नोटा बटन प्रदान किया जाना चाहिए ताकि मतदाताओं को 'उपर्युक्त में से कोई नहीं' चुनने का विकल्प मिल सके।

नोटा शुरू करने की आवश्यकता

हमारे देश में, अक्सर ऐसा होता है कि मतदाता चुनाव में किसी भी उम्मीदवार का समर्थन नहीं करना चाहता है, लेकिन उसके पास किसी एक उम्मीदवार का चयन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। भारत में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के मुताबिक, 'उपर्युक्त में से कोई नहीं' यानी मतदाताओं के लिए नोटा विकल्प की शुरूआत से चुनावों में व्यवस्थित परिवर्तन होगा और राजनीतिक दलों को सही उम्मीदवारों को पेश करने के लिए मजबूर किया जाएगा। एक मतदान प्रणाली में, मतदाता को सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने की अनुमति दी जानी चाहिए। इस विकल्प को शुरू करने का उद्देश्य मतदाता को सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने के लिए सशक्त बनाना है यदि उन्हें ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) में सूचीबद्ध सभी उम्मीदवार पसंद नहीं हैं। राजनीतिक दलों को चुनाव में उनकी ओर से सही उम्मीदवारों को नामित करने के विकल्प के साथ छोड़ दिया जाएगा। आपराधिक या अनैतिक पृष्ठभूमि वाले अभ्यर्थियों के पास चुनाव लड़ने से बचने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।

नियम 49-ओ क्या है? और यह नोटा से किस प्रकार भिन्न है?

चुनाव नियमों के आचरण के अनुसार, 1961 नियम 49-ओ बताता है कि "मतदाता मतदान न करने का फैसला कर रहे हैं - यदि कोई मतदाता, फॉर्म -7 ए में मतदाताओं के रजिस्टर में अपने चुनावी रोल नंबर को विधिवत दर्ज करने के बाद और नियम 49 एल के उप-नियम (1) के तहत आवश्यक हस्ताक्षर कर देता है या अंगूठे की छाप लगा देता है, तो इसका मतलब है कि उसने अपना वोट रिकॉर्ड न करने का फैसला किया है, इस प्रभाव की एक टिप्पणी पीठासीन अधिकारी द्वारा फॉर्म 17 ए में दी गई प्रविष्टि के खिलाफ की जाएगी और मतदाता के हस्ताक्षर या अंगूठे की छाप इस तरह के टिप्पणी के खिलाफ प्राप्त की जाएगी।" 49-ओ और नोटा के बीच अंतर यह है कि 49-ओ गोपनीयता प्रदान नहीं करता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नोटा प्रावधान को मंजूरी मिलने के बाद धारा 49 (ओ) को खारिज कर दिया गया। इस धारा ने चुनाव अधिकारियों को फॉर्म 17 ए में मतदाता की टिप्पणियों के माध्यम से उम्मीदवार को अस्वीकार करने का कारण जानने का मौका दिया। नोटा के माध्यम से, अधिकारियों को अस्वीकृति का कारण नहीं पता हो सकता है। इसके अलावा, यह एक मतदाता की पहचान का बचाव करता है, इस प्रकार यह गुप्त मतपत्र की अवधारणा को बरकरार रखता है।


नोटा के सकारात्मक बिन्दु

हालांकि मतदाता के लिए चुनावों में 'उपर्युक्त में से कोई नहीं' विकल्प के बारे में बहुत से नकारात्मक बिंदु हैं लेकिन सकारात्मक बिंदुओं को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। भारत के सुप्रीम कोर्ट का इरादा राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों के रूप में एक ईमानदार तथा अच्छी पृष्ठभूमि के साथ उम्मीदवार पेश करने के लिए मजबूर करना था। चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार देश को शासित करते हुए विधायिका का हिस्सा बन जाते हैं। इसलिए, यह अनिवार्य रूप से महसूस किया गया कि आपराधिक, अनैतिक या भ्रष्ट पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार चुनाव लड़ने से रोक दिए जाएं। यदि 'उपर्युक्त में से कोई नहीं' का यह विकल्प अपने वास्तविक इरादे से लागू नहीं किया गया, तो देश का पूरा राजनीतिक परिदृश्य वर्तमान परिदृश्य से काफी हद तक बदल जाएगा।

नोटा के नकारात्मक बिन्दु

प्रारंभिक रूप से मतदाताओं को इस तरह के विकल्प पेश करने वाले कुछ देशों ने बाद में प्रणाली को बंद कर दिया या समाप्त कर दिया। उन देशों में जहां मतदान मशीनों में नोटा बटन होता है, वहां वोटों का बहुमत प्राप्त करने की संभावना होती है और इसलिए वो चुनाव "जीत" जाते है। ऐसे मामले में, चुनाव आयोग इनमें से किसी भी विकल्प का चयन कर सकता है ए) कार्यालय को रिक्त रखें, बी) नियुक्ति के द्वारा कार्यालय भरें, सी) एक और चुनाव आयोजित करें। इस प्रकार की स्थिति में नेवादा राष्ट्र की नीति इसके प्रभाव को नजरअंदाज कर देती है और अगला सबसे ज्यादा वोट पाने वाला जीत जाता है।

2014 के चुनावों में नए रुझान

ईवीएम: इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को वर्ष 1999 में भारत के निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा प्रस्तुत किया गया था। मतदान के इस इलेक्ट्रॉनिक तरीके ने मतदान के लिए लगने वाले समय को कम करने में और परिणामों की घोषणा करने में मदद की है।

वीवीपीएटी: वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल इस वर्ष प्रयोगात्मक आधार पर पेश की जाएगी। जैसे ही वोट डाला जाता है, एक पेपर पर्ची निकलती है जिसमें लिखा होता है, किस चिन्ह और उम्मीदवार को वोट दिया गया है, ईवीएम से जुड़े एक मुहरबंद बॉक्स में स्व.चालित रूप से गिर जाएगी। ईसी द्वारा इस पर्ची का उपयोग वोट गिनने में किया जाएगा।
Last Updated on October 22, 2018